कफ सिरप

क्या भारत में बिना डॉक्टर की पर्ची के कफ सिरप मिल सकती है? 

सरकार ने एक नियम बदला, लेकिन मीडिया ने उसे गलत तरीके से पेश किया। 16 जून 2026 को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक प्रेस नोट जारी किया, जिसमें बताया गया कि “Schedule K” से “सिरप” शब्द हटा दिया गया है। कुछ ही घंटों में कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जाने लगा कि अब कफ सिरप बिना डॉक्टर की पर्ची के नहीं मिलेगा।  

कुछ खबरों ने तो इस बदलाव को 2025 में मध्य प्रदेश और राजस्थान में हुई कफ सिरप त्रासदी से भी जोड़ दिया। लेकिन अगर प्रेस नोट को ध्यान से पढ़ें, तो तस्वीर कुछ और ही सामने आती है। सबसे पहले, यह संशोधन सिर्फ कफ सिरप से जुड़ा नहीं है। यह सभी एलोपैथिक सिरप पर लागू होता है, जैसे कफ सिरप, बुखार की सिरप और मल्टीविटामिन सिरप। इसलिए इस बदलाव का सही मतलब समझना ज़रूरी है। आइए जानते हैं कि मंत्रालय ने वास्तव में क्या कहा है और इसका आम लोगों के लिए क्या मतलब है।

हाल में क्या बदला?

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने Schedule K से “सिरप” शब्द हटा दिया है। 

Drugs and Cosmetics Rules, 1945 के Rule 123 के तहत आने वाला Schedule K कुछ ऐसी दवाइयों की सूची है, जिन्हें खास परिस्थितियों में पंजीकृत (Registered) मेडिकल स्टोर के अलावा भी बेचा जा सकता था। यह छूट मुख्य रूप से उन इलाकों के लिए थी, जहाँ आबादी 1,000 या उससे कम हो और पंजीकृत मेडिकल स्टोर उपलब्ध न हो। 

व्यवहार में इसका मतलब यह था कि छोटे कस्बों और गाँवों में कई तरह के एलोपैथिक सिरप बिना पंजीकृत मेडिकल स्टोर से भी बेचे जा सकते थे। 

अब, Schedule K से “सिरप” हटाए जाने के बाद, सभी एलोपैथिक सिरप केवल पंजीकृत मेडिकल स्टोर से ही बेचे जा सकेंगे, चाहे वह शहर हो या गाँव। 

ध्यान देने वाली बात यह है कि इस बदलाव का मतलब यह नहीं है कि अब हर सिरप खरीदने के लिए डॉक्टर की पर्ची ज़रूरी होगी। 

इसका मतलब सिर्फ इतना है कि अब कफ सिरप, बुखार की सिरप, यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI) की सिरप या किसी भी अन्य एलोपैथिक सिरप की बिक्री केवल पंजीकृत मेडिकल स्टोर के माध्यम से होगी, ताकि उनकी निगरानी बेहतर तरीके से की जा सके।

 

शहरों में इस बदलाव का ज़्यादा असर शायद महसूस न हो, क्योंकि वहाँ अधिकांश लोग पहले से ही पंजीकृत मेडिकल स्टोर से दवाइयाँ खरीदते हैं। लेकिन छोटे कस्बों और गाँवों में यह नियम दवाइयों की बिक्री और निगरानी के तरीके में एक बड़ा बदलाव लेकर आएगा। 

यह फैसला सरकार के उस पहले के निर्देश से भी जुड़ा हुआ है, जिसमें सिरप बनाने वाली कंपनियों के लिए Diethylene Glycol (DEG) और Ethylene Glycol (EG) की जांच अनिवार्य की गई थी। यानी सरकार सिरप की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर लगातार नियमों को और सख्त बना रही है। 

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बदलाव का आम लोगों पर वास्तव में क्या असर पड़ेगा?

इस बदलाव का क्या असर पड़ेगा?

1. दवाइयों के गलत इस्तेमाल पर रोक

खासकर कफ सिरप जैसी कुछ सिरप में ऐसे तत्व होते हैं, जिनका नशे के लिए गलत इस्तेमाल किया जाता है। 

अब जब ये सिरप सिर्फ पंजीकृत मेडिकल स्टोर से ही बेची जाएँगी, तो उनकी बिक्री पर बेहतर निगरानी रहेगी। इससे गलत इस्तेमाल पर रोक लगाने में मदद मिलेगी और ज़रूरत पड़ने पर यह पता लगाना भी आसान होगा कि दवा किसे बेची गई थी।

2. दवाइयों की बेहतर निगरानी

अब सभी एलोपैथिक सिरप सिर्फ पंजीकृत मेडिकल स्टोर से ही बेची जाएँगी। इससे ड्रग इंस्पेक्टरों के लिए दवाइयों की निगरानी करना आसान हो जाएगा। 

पंजीकृत मेडिकल स्टोर को यह रिकॉर्ड रखना होता है कि उन्होंने कौन-सी दवा खरीदी और किसे बेची। ऐसे में अगर किसी दवा से जुड़ी कोई समस्या सामने आती है, तो उसकी पूरी सप्लाई चेन को ट्रैक करना पहले के मुकाबले आसान होगा।

3. बेहतर स्टोरेज, ज़्यादा सुरक्षित दवाइयाँ

टैबलेट्स की तुलना में सिरप तापमान और गर्मी के प्रति ज़्यादा संवेदनशील होती हैं। अगर इन्हें सही तापमान पर स्टोर न किया जाए, तो उनकी गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। 

यही वजह है कि पंजीकृत मेडिकल स्टोर पर सही स्टोरेज व्यवस्था होना बेहद ज़रूरी है। दूसरी ओर, कई अपंजीकृत दुकानों में ऐसी सुविधाएँ नहीं होतीं। 

इससे जुड़ा एक और महत्वपूर्ण पहलू भी है। कई सिरप में Polyethylene Glycol (PEG) नाम का एक पदार्थ इस्तेमाल किया जाता है। अगर सिरप को लंबे समय तक खराब परिस्थितियों में रखा जाए, तो कुछ स्थितियों में यह टूटकर Diethylene Glycol (DEG) में बदल सकता है। यही रसायन भारत में हुई कई कफ सिरप त्रासदियों से जुड़ा रहा है। 

जब सिरप केवल पंजीकृत मेडिकल स्टोर से बेची जाएँगी, तो उनके सही तरीके से स्टोर होने की संभावना बढ़ेगी और ऐसे जोखिम को कम करने में मदद मिलेगी।

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इस नियम की सीमाएँ

यह संशोधन सभी एलोपैथिक सिरप पर लागू होता है, सिर्फ कफ सिरप पर नहीं। लेकिन भारत में हुई कफ सिरप त्रासदियाँ आज भी यह दिखाने वाले सबसे बड़े उदाहरण हैं कि जब दवाइयों के नियमन में कमी रह जाती है, तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। 

इन घटनाओं को समझने से यह भी पता चलता है कि इस नए नियम की अपनी कुछ सीमाएँ हैं।

1. दवा की गुणवत्ता की गारंटी नहीं

यह नियम इस बात पर ज़्यादा ध्यान देता है कि सिरप कहाँ से बेची जाएगी, लेकिन इस पर नहीं कि सिरप की गुणवत्ता कैसी है।

यानी कोई पंजीकृत मेडिकल स्टोर भी ऐसी सिरप बेच सकता है, जिसकी गुणवत्ता खराब हो या जिसमें मिलावट हो। पहले हुई कई कफ सिरप त्रासदियों में भी दवाइयाँ वैध सप्लाई चेन के ज़रिए ही लोगों तक पहुँची थीं। इससे साफ है कि दवाइयों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना एक अलग चुनौती है, जिसे सिर्फ इस नियम से हल नहीं किया जा सकता।

2. समस्या सिर्फ गाँवों तक सीमित नहीं

यह बदलाव छोटे कस्बों और गाँवों में दवाइयों की बिक्री को बेहतर तरीके से नियंत्रित करने के उद्देश्य से लाया गया है। लेकिन अब तक सामने आए कफ सिरप त्रासदी के मामलों को देखें, तो समस्या सिर्फ ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं रही। 

भारत में दर्ज कफ सिरप त्रासदी के मामलों में पीड़ित गाँवों और शहरों, दोनों जगहों से थे। यानी केवल स्थान बदल देने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। 

भारत में हुई कफ सिरप त्रासदियों के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें।

3. सेल्फ-मेडिकेशन की समस्या बनी रहेगी

यह नियम सिरप की बिक्री को नियंत्रित करता है, लेकिन लोगों की आदतों को नहीं। 

आज भी बड़ी संख्या में लोग डॉक्टर से सलाह लेने के बजाय सीधे मेडिकल स्टोर जाकर किसी खास सिरप का नाम बताते हैं और वही दवा खरीद लेते हैं। यह समस्या शहरों और गाँवों, दोनों जगह मौजूद है।

4. ज़रूरतमंद लोगों के लिए दवा तक पहुँच मुश्किल हो सकती है

हर सिरप कफ सिरप नहीं होती। 

आयरन सिरप और मल्टीविटामिन सिरप गर्भवती महिलाओं के लिए रोज़मर्रा की ज़रूरत हो सकती हैं। बुखार, एलर्जी और भूख बढ़ाने वाली सिरप भी कई परिवारों में बच्चों के लिए नियमित रूप से खरीदी जाती हैं।

अगर ऐसे इलाकों में, जहाँ पंजीकृत मेडिकल स्टोर बहुत कम हैं, इन सभी सिरप की बिक्री सिर्फ पंजीकृत मेडिकल स्टोर तक सीमित कर दी जाए, तो लोगों के लिए समय पर दवा लेना मुश्किल हो सकता है। 

ऐसी स्थिति में ई-फार्मेसी एक बेहतर विकल्प बन सकती हैं। वे इस नियम के तहत तय जवाबदेही को बनाए रखते हुए दूर-दराज़ के लोगों तक दवाइयाँ पहुँचाने में मदद कर सकती हैं।

आखिर में

एक और महत्वपूर्ण बात पर ध्यान देना ज़रूरी है। 

भारत में अब तक सामने आई कफ सिरप त्रासदी के सभी 6 मामलों में प्रभावित लोग आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से थे। इनमें से अधिकांश मामलों में दवा डॉक्टर ने ही लिखी थी। यानी समस्या डॉक्टर की पर्ची या दवा लिखने की प्रक्रिया में नहीं थी। 

असल सवाल यह है कि गड़बड़ी मैन्युफैक्चरिंग के दौरान कहाँ हुई? गुणवत्ता की जांच क्यों नाकाम रही? और सुरक्षा मानकों का सही तरीके से पालन क्यों नहीं हुआ?

नए नियम से यह तय हो गया है कि सिरप कौन बेच सकता है। लेकिन सिरप कौन बना रहा है, उसकी गुणवत्ता कैसी है और उसमें क्या मौजूद है, इन सवालों का जवाब अभी भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। 

जब तक दवा निर्माण के स्तर पर गुणवत्ता की सख्त निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक सिर्फ बिक्री के नियम बदलने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। 

Schedule K में किया गया यह बदलाव सही दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन सिरप कहाँ बिक रही है, उससे भी ज़्यादा ज़रूरी यह सुनिश्चित करना है कि सिरप के अंदर क्या है।

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